शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

फेफड़ों की गंभीर बीमारी है सिलिकोसिस 
-बीमारी होने पर सरकार देती है एक लाख और मौत पर तीन लाख रूपए की सहायता राशि

        -विनोद बिश्रोई -

श्रीगंगानगर। सिलिकोसिस फेफड़ों में होने वाला भयंकर रोग है, जो प्राय: रेत व पत्थर की खदानों, पहाड़ों व चट्टानों की ब्लास्टिंग, के्रशर, पत्थरों की कटाई व पिसाई आदि में कार्य कर मजदूरों में होता है। वहीं सडक़ व भवन निर्माण में कार्यरत मजदूर भी इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं। ऐसे में जरूरी है कि इस बीमारी के प्रति आमजन, खासकर मजदूर वर्ग में व्यापक जानकारी हो ताकि वे इससे बच सकें। एक अहम जानकारी ये भी कि राज्य सरकार सिलिकोसिस पीडि़तों को एक लाख रूपए की सहायता राशि दे रही है। वहीं यदि रोगी की मौत हो जाए और इसी बीमारी से मौत की पुष्टि हो जाए तो तीन लाख रूपए तक सहायता राशि राज्य सरकार दे रही है। 
सिलिकोसिस रोग के लक्षणों में प्रमुखत: रोगी को शुरूआत में व्यायाम या कार्य करते समय श्वास लेने में परेशानी होती है। बाद में जैसे-जैसे रोग बढ़ता है रोगी का श्वास फूलने लगता है। खांसी, बलगम और बिना बलगम के खांसी लगातार रहती है। खांसी के साथ खून आना, बुखार आना, वजन घटना, अन्य संक्रमित रोग भी हो जाते हैं। मसलन, ट्यूबर कोलोसिस के लक्षण आदि। घबराहट, छाती में जकडऩ, श्वास में रूकावट, कठिनाई जैसे अन्य लक्षण भी रोगी में पाए जाते हैं। 
सिलिकोसिस का उपचार
विशेषज्ञों के मुताबिक सिलिकोसिस का कोई उपचार नहीं है। इसका इलाज व बचाव मुख्यत: लक्षणों व संक्रमण पर निर्भर करता है। जैसे की रोगी को धूम्रपान नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे रोग बढ़ता है। धूल के संपर्क में आने से बचना चाहिए। इस व्यवसाय को रोकने मात्र से ही यह रोग नहीं रोका जा सकता है। इस मामले में सुझाव यही दिया जाता है कि फेफड़ों को क्षति होने से बचाना चाहिए। अंतिम अवस्था में ऑक्सीजन एवं कृत्रिम वायु संचार दिया जा सकता है। शारीरिक एवं मानसिक पुनर्वास रोगी के जीवन की उत्तमता को सुनिश्चित करना एवं उसे निराशा से बचाना ही बचाव है। 
सिलिकोसिस को रोकने के उपाय
रोकथाम इलाज से बेहतर है क्योंकि इसका कोई इलाज नहीं है। इससे बचाव की एकमात्र उपाय है। बचाव प्रत्येक स्तर पर होना चाहिए। मसलन, फेक्ट्री और खान प्रशासन अपने मजदूरों के स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार हैं, इसलिए वे उनकी नियमित जांच करवाएं। कार्य करने के तरीकों को जोखिम के अनुसार बदलें। प्रबंधन को ध्यान रखना चाहिए कि कार्य क्षेत्र में स्नानगृह, फव्वारे, साफ एवं गंदे कपड़ों की अलग-अलग व्यवस्था हो। जलपान के लिए अलग व्यवस्था हो। सूचना, प्रशिक्षण एवं पर्यवेक्षण नियमित हो। वहीं हवा संचान जैसे संसाधन उपलब्ध हों। इसके साथ ही व्यक्तिगत बचाव भी जरूरी है। कार्य करने वाले लोगों को चाहिए कि वे अत्यधिक धूल वाले स्थान पर श्वास लेने से बचें, यानी मुंह ढक कर रखें और स्वच्छ जगह पर जाकर सांस ले। कार्य को सावधानीपूर्ण करें। धूल, दमन एवं निष्कर्षण उपकरणों का इस्तेमाल करना चाहिए। इन उपकरणों को साफ सुथरा रखना चाहिए। धूल युक्त त्वचा को नियमित रूप से साफ करें। रूई एवं उनी कपड़ों से बचें। 
राज्य सरकार की ओर से दी जा रही सहायता
हितलाभ - सिलिकोसिस पीडि़त होने पर एक लाख रूपए और
सिलिकोसिस से पीडि़त की मृत्यु होने पर तीन लाख रूपए की सहायता
पात्रता एवं शर्ते
1. पंजीकृत निर्माण श्रमिक हिताधिकारी हों।
2. सिलिकोसिस से पीडि़त होना न्यूमोकोनियोसिस मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रमाणित किया गया हो।
3. हिताधिकारी को राजस्थान एनवायरमेन्ट एण्ड हैल्थ सैस फण्ड से सहायता राशि प्राप्त नहीं हुई हो।
4. वे श्रमिक, जिन पर खान अधिनियम, 1952 के प्रावधान लागू होते हैं, वे सहायता राशि प्राप्त करने के पात्र नहीं होंगे।
आवेदन की समय सीमा
मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रमाण-पत्र दिए जाने से 6 माह तक तथा मृत्यु की दशा में मृत्यु की तिथि से 6 माह की अवधि तक।
वांछित दस्तावेज
1. मृत्यु होने की दशा में मृत्यु प्रमाण पत्र।
2. न्यूमोकोनियोसिस मेडिकल बोड का सिलिकोसिस संबंधी प्रमाण-पत्र।
3. हिताधिकारी पंजीयन परिचय पत्र या कार्ड की प्रति
4. भामाशाह परिवार कार्ड या भामाशाह नामांकन की प्रति
5. आधार कार्ड की प्रति
6. बैंक खाता पासबुक के पहले पृष्ठ की प्रति


‘‘दरअसल सिलिकोसिस व्यवसायिक जनिक फेफड़ों का रोग है जो श्वास लेने से क्रिस्टलीय सिलिका के कणों के फेफड़ों में एकत्र होने से होता है। सिलिका या सिलिकोन डाईऑक्साइड धरती के परतों में पाई जाती है। यह एक घातक रोग है, क्योंकि यह जल्दी से फैलता है और इससे स्थाई विकलांगता हो जाती है। इस बीमारी के कारण जल्दी मृत्यु होने की संभावना बढ़ जाती है।’’
डॉ. नरेश बंसल, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, श्रीगंगानगर 

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