रविवार, 19 अगस्त 2018

आजादी पर्व पर मासूम नेहा को मिली बीमारी से आजादी
-आगंनबाड़ी कार्यकर्ता की बदौलत हृद्य रोग पीडि़त को मिला आरबीएसके के तहत उपचार
श्रीगंगानगर। दिल की गंभीर बीमारी से जूझ रही श्रीगंगानगर निवासी दो वर्षीय नन्हीं नेहा के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम वरदान साबित हुआ और भगवान का दूत बनकर आईं गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पलविंद्र कौर। खासकर, आरबीएसके ने नेहा को आजादी पर्व पर बीमारी से आजादी दिलवाई, जिसके बाद वह और उसके परिजन बेहद खुश हैं। इस बीमारी के इलाज पर करीब अढ़ाई से तीन लाख रुपए खर्च होते लेकिन आरबीएसके के जरिए पूर्णत: नि:शुल्क ऑपरेशन व उपचार हुआ, वो भी राज्य के राजधानी जयपुर स्थित प्रतिष्ठित एवं उच्च चिकित्सा संस्थान में। फिलहाल, नेहा पूरी तरह से स्वस्थ है और वह अपनी सामान्य जिंदगी जीने लगी है। 
सीओआईईसी विनोद बिश्रोई ने बताया कि गांव 11वाई निवासी मोनू बेहद निर्धन एवं मजदूरी पेशा है। उनकी लाडली नेहा जन्म से ही बीमार रहने लगी, जिसका वह सामान्य इलाज करवाते रहे लेकिन कोई असर नहीं हुआ। इस बीच श्रीगंगानगर आरबीएसके टीम 11वाई आंगनबाड़ी केंद्र पहुंची तो उन्हें कार्यकर्ता पलविंद्र कौर ने नेहा की जानकारी टीम को दी। टीम में शामिल डॉ. सोनल कथूरिया व फार्मासिस्ट गुंजन शर्मा ने बच्ची की जांच में पाया कि उसे हृद्य संबंधी बीमारी है जिसकी ईको करवाने पर पुष्टि हुई। इसके बाद टीम ने मोनू को बच्ची के ऑपरेशन के लिए जयपुर जाने के लिए कहा लेकिन मोनू को यकीन नहीं हुआ कि ऐसे सरकारी सिस्टम के जरिए नि:शुल्क उपचार भी हो सकता है। बकौल मोनू, ‘‘महज दो साल की बेटी को गंभीर बीमारी सुनकर होश खो बैठा था। न बीमारी का यकीन और न ही यह यकीन कि इस तरह बेटी का नि:शुल्क उपचार हो जाएगा। लेकिन आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने बार-बार संपर्क किया और समझाया कि नेहा का इलाज बेहद जरूरी है। किसी से जानकारी ली तो मालूम हुआ कि इलाज पर करीब तीन लाख रुपए खर्च होंगे, जो मुझ निर्धन के लिए असंभव राशि थी। आखिरकार, मैं नेहा को लेकर जयपुर के नारायणा हॉस्पीटल में गया, जहां पूर्णत: नि:शुल्क इलाज भी हुआ और डॉक्टरों ने बहुत ही अच्छी देखभाल भी की। डॉक्टरों को भगवान क्यों कहते हैं, यह मैं इन डॉक्टरों से मिलकर समझा। उन्होंने हम जैसे गरीबों के साथ अपनों जैसा व्यवहार किया और नेहा को बेटी समझकर उपचार किया। मैं सरकार का सदैव आभारी रहूंगा।’’
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने निभाया फर्ज 
गांव की नींव कहे जाने वाले आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पलविंद्र कौर ने नेहा के लिए जो प्रयास किए वे वाकई काबिलेतारीफ है, क्योंकि इन्हीं कोशिशों के जरिए नेहा को नया जीवन मिला। दरअसल, पलविंद्र कौर ने नेहा के घर कई चक्कर लगाए लेकिन नेहा के परिजन अज्ञात भय के चलते तैयार नहीं हुए। उन्होंने इधर-उधर से जानकारी लेने और स्थानीय चिकित्सकों से ही सामान्य उपचार करवाने में काफी समय जाया किया। आखिरकार, पलविंद्र कौर की मेहनत रंग लाई और नेहा का उपचार हो सका। बकौल पलविंद्र कौर, ‘‘नेहा का मासूम चेहरा बार-बार सामने आता और मैं हर दिन दिल से प्रयास करती कि इस बेटी का उपचार हो जाए। मोनू सहित उसकी दादी एवं माँ को भी बार-बार समझाया कि उपचार बहुत जरूरी है। उन्हें शायद यह लगता कि मैं पैंसों के लिए या किसी अन्य लालच में ऐसा कर रही रहूं, जबकि मुझे केवल नेहा की जिंदगी की फिक्र थी। शुक्र है वे देर ही सही, बात को समझे और नेहा के उपचार के लिए राजी हुए। मैं चाहती हूं कि अन्य परिजन आरबीएसके टीम का सहयोग करें ताकि बच्चों का समय रहते उपचार मिल सके।’’ 

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