दिव्यांग किरण की सोच, सकारात्मक रोशनी की किरण
ये हैं किरण कुमार। दिखने में भले ही ये और इनकी पत्नी शारीरिक रूप से विकलांग हैं लेकिन मानसिक रूप से कतई नहीं। उन लोगों की तरह तो बिल्कुल भी नहीं जो मानसिक रूप से विकलांगता के चलते बेटा-बेटी में भेद करते हैं, जो कोख में कत्ल करवाते हैं। किरण, श्रीकरणपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के पास चाय की दुकान चलाते हैं। गर्मी-सर्दी में सबका स्नेह-प्यार साझा करते हैं। यहीं बैठने वाले लोगों और सामने बने अस्पताल से समाज में होने वाले बदलाव के प्रति जागरूक होते हैं, कुछ सकारात्मक बातें सीखते हैं। संभवत: जागरूकता का ही असर है कि आज इन्होंने समाज को वो आईना दिखाया, जिसे हर तबके को सलीके से देखने की जरूरत है।
हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए मुस्कुराते चेहरे से आज जब ये श्रीकरणपुर ब्लॉक ऑफिस में आए तो एकबारगी यकीन करना मुश्किल था कि यह खुशी, यह मिठाई बेटी के जन्म पर बांटी जा रही है। लेकिन जब इन्होंने कहा कि ‘साहब! मेरे घर लक्ष्मी आई है, खुशी तो होगी ही . . . तो माहौल भी खुशनुमा हो उठा। लगा आज भगवान भी बंूदे बरसा, खुशी मना रहे हैं, बिटिया जो आई है।
वाकई में, समाज में यह बदलाव बेहद जरूरी है। करणी सिंह जैसे लोग ही सही मायने में समाज में सकारात्मक माहौल बना सकते हैं, या कहें कि बना रहे हैं। उम्मीद है कि समाज के वे लोग जो भू्रण हत्या कर, खुद को कथित सभ्य परिवार से होने का दंभ भरते हैं वे इनसे कुछ सीखेंगे।
और हां, करणी सिंह जैसे लोगों की ऐसी दास्तां हर कोने-हर कस्बे-हर शहर में मिल जाती है, पर हमें फुरस्त कहां। लेकिन स्वास्थ्य विभाग के बीपीएम सुनील कुमार ने इस लम्हे को साझा किया और संदेश भी दिया कि हमें सकारात्मक नजरिए से, हर सकारात्मक बदलाव को साझा करने की जरूरत है ताकि समाज में सकारात्मक बदलाव आ सके। बेटियां बच सके।

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